Wednesday, October 21, 2009

1 सर फूल वो चढा जो चमन से निकला , कामयाबी उसे मिली जो वतन से निकला |

2 उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, ना जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये|

3 एक छोटा सा व्यंग है हमारी लोकतान्त्रिक व्वस्था पर, कुछ वक़्त पहले लोकतंत्र के पर्व चुनाव में बन्दूक चलते थे, उसी पर कुछ लिखा था.

हाय ये राजनीती , बीना नीति की ये राज, हाय ये राजनीती ,
हमारा भारत महान , अपना गणतंत्र महान
लेकिन अब गन(GUN) तंत्र महान
हाय ये राजनीती
आया गणतंत्र का महापर्व, हर गन इसका हिस्सा बनेगा,
हाय ये राजनीती हाय ये राजनीती ...


4 अल्फाज नहीं मिलते क्या बयां करूँ,
खामोश हैं होंठ, दिल में कोई जज्बात नहीं
समंदर की गहराई मे जाना चाहता हूं
दिल को तस्सली के सिवा कुछ दे नहीं सकता,
ज़ख्म दिखते नहीं अभी, धुआं है धुआं सिर्फ और कुछ नहीं...

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